तिलस्मी
भाग प्रथम
लेखक — चाँदनी चौधरी
विरानपुर के राजकुमार उदय सिंह और बीसरपुर के राजकुमार अमर सिंह परम मित्र थे। दोनों के विचार ऊँचे और जीवन आदर्शों से परिपूर्ण थे। उनका बचपन साथ ही बीता था और दोनों ने एक साथ गुरुकुल में शिक्षा प्राप्त की थी। दोनों हमउम्र थे तथा हृष्ट-पुष्ट, वीर और साहसी राजकुमार थे।
उदय सिंह के पिता महाराज करत सिंह और अमर सिंह के पिता महाराज शमर सिंह भी बचपन से ही परम मित्र थे। समय के साथ उनकी मित्रता और विश्वास और भी गहरा होता गया और वही मित्रता उनके पुत्रों के बीच भी बनी रही।
दोनों राजकुमार अपने-अपने राज्यों की प्रजा के हित को सर्वोपरि रखते थे। उनके शासन में प्रजा सुखी और समृद्ध थी। वे अपनी खुशी अपनी प्रजा की खुशी में खोजते थे।
उदय सिंह और अमर सिंह को शिकार पर जाना बहुत पसंद था। वे अक्सर साथ-साथ दूर-दराज के जंगलों और नगरों की यात्राएँ करते। इन्हीं यात्राओं के दौरान उन्हें एक रहस्यमय तिलस्मी महल के बारे में पता चला था।
वह महल उनके राज्यों से कुछ ही दूरी पर स्थित था, किंतु घनी झाड़ियों और पेड़ों से इस प्रकार ढका हुआ था कि किसी सामान्य व्यक्ति की नजर उस पर पड़ना कठिन था।
उस तिलस्मी महल के बारे में केवल उदय सिंह और अमर सिंह जानते थे। उन्होंने कभी किसी को उसके अस्तित्व का आभास तक नहीं होने दिया था।
दोनों राजकुमार उस रहस्यमय स्थान से बहुत आकर्षित थे। वे कभी-कभी वहाँ जाते, बहते हुए झरनों को देखते, पेड़ों से फल और बेर खाते तथा उस स्थान की अद्भुत सुंदरता में खो जाते।
लेकिन उन्होंने अभी तक उस तिलस्मी महल का पूरा रहस्य नहीं जाना था।
अब दोनों बीस वर्ष के युवा राजकुमार थे। जीवन में सब कुछ होते हुए भी अभी तक उनके हृदय में प्रेम का कोई भाव नहीं आया था।
एक दिन दोनों साधारण वेश धारण करके दुनावत नगर में घूम रहे थे। उन्हें सामान्य लोगों के बीच रहना और उनके जीवन को निकट से देखना अच्छा लगता था।
तभी एक दुकान के पास से उन्हें एक मधुर और लयात्मक धुन सुनाई दी।
धुन इतनी मनमोहक थी कि दोनों राजकुमार वहीं रुक गए। कुछ ही क्षणों में वे उस संगीत में खो गए।
उसी समय दुनावत नगर के महाराज विराज सिंह की दोनों पुत्रियाँ—रूपवती और संगना—भी वहाँ आ पहुँचीं। वे भी उस मधुर धुन को सुनने लगीं।
धुन समाप्त हुई तो सभी जैसे अपने-अपने विचारों में लौट आए।
तभी उदय सिंह की नजर रूपवती पर पड़ी।
रूपवती अत्यंत कोमल, सुंदर, सुसज्जित और भोली-भाली दिखाई दे रही थी। उदय सिंह उसे देखते ही जैसे अपने आसपास की दुनिया भूल गए।
उसी क्षण रूपवती की नजर भी उदय सिंह से जा मिली।
भीड़ के बीच दोनों की आँखें मिलीं और कुछ पल के लिए समय जैसे ठहर गया।
अमर सिंह ने उदय सिंह को पुकारा, लेकिन उदय सिंह ने कुछ नहीं सुना।
अंततः अमर सिंह ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा—
“उदय सिंह! कहाँ खो गए मित्र? मैं न जाने कितनी देर से तुम्हें पुकार रहा हूँ।”
उदय सिंह जैसे किसी स्वप्न से बाहर आए। उन्होंने स्वयं को सामान्य दिखाने का प्रयास किया, लेकिन उनकी नजरें बार-बार रूपवती की ओर उठ जाती थीं।
उधर संगना भी अपनी बड़ी बहन को न जाने कितनी देर से पुकार रही थी।
“दीदी! रूपवती दीदी!”
लेकिन रूपवती को कुछ सुनाई ही नहीं दे रहा था।
संगना ने उसके पास जाकर उसका हाथ पकड़ लिया।
“दीदी, मैं आपको कितनी देर से पुकार रही हूँ। आपने कुछ सुना भी नहीं!”
रूपवती अचानक अपने विचारों से बाहर आई। उसके कोमल गाल हल्के गुलाबी हो गए थे और चेहरे पर एक अनजानी खुशी झलक रही थी।
संगना मुस्कुराकर बोली—
“दीदी, आपके चेहरे पर तो आज अलग ही चमक है। कहीं आपका किसी राजकुमार पर दिल तो नहीं आ गया?”
यह सुनकर रूपवती शरमा गई।
“पता नहीं... जब तुम्हें किसी राजकुमार से प्रेम होगा, तब बताना कि तुम्हारा दिल आया है या नहीं।”
दोनों बहनें मुस्कुरा उठीं।
इसी बीच महाराज विराज सिंह के संदेश पर दोनों राजकुमारियों को तुरंत महल बुला लिया गया।
दुनावत नगर, विरानपुर और बीसरपुर के निकट ही था। महाराज विराज सिंह की दो ही संतानें थीं—रूपवती और संगना। कोई पुत्र न होने के कारण वे अपनी बड़ी पुत्री रूपवती को लेकर विशेष रूप से चिंतित रहते थे।
जब दोनों बहनें महल पहुँचीं, तो उन्होंने देखा कि महाराज विराज सिंह गहरी चिंता में डूबे हुए थे।
रूपवती ने पूछा—
“पिताजी, आपने हमें इतनी जल्दी क्यों बुला लिया?”
महाराज विराज सिंह ने स्नेह से उसकी ओर देखते हुए कहा—
“जब तक मैं तुम्हें दिन में एक बार देख नहीं लेता, मुझे चैन नहीं आता। आज तुम सुबह से यहाँ नहीं थीं, इसलिए मैं परेशान हो गया था।”
रूपवती अपने पिता के गले लग गई।
उधर उदय सिंह और अमर सिंह अपने गुप्त तिलस्मी महल में पहुँच चुके थे।
उस दिन दोनों ने वहीं रात में विश्राम करने का निश्चय किया।
संध्या होते ही उन्होंने स्नान किया, पूजा-पाठ किया और अपने वस्त्र सुखाने के लिए रख दिए। फिर स्वच्छ वस्त्र धारण किए।
कुछ समय बाद अमर सिंह भोजन के लिए फल और बेर इकट्ठे करने चला गया।
उदय सिंह एक चौतरे के पास बैठा था।
लेकिन उसका मन वहाँ नहीं था।
वह बार-बार रूपवती के बारे में सोच रहा था। उसकी आँखों के सामने बार-बार वही दृश्य आ रहा था—भीड़, मधुर धुन और रूपवती की आँखों से मिलती उसकी आँखें।
उसे पता ही नहीं चला कि अमर सिंह कब वहाँ से चला गया।
धीरे-धीरे अँधेरा गहराने लगा। आकाश में तारे टिमटिमाने लगे।
तभी बारिश की कुछ बूँदें उदय सिंह के शरीर पर पड़ीं।
वह उठकर चारों ओर देखने लगा।
अमर सिंह कहीं दिखाई नहीं दिया।
“अमर सिंह!”
उसने आवाज लगाई।
कोई उत्तर नहीं आया।
उसने फिर पुकारा—
“अमर सिंह!”
चारों ओर केवल जंगल की निस्तब्धता थी।
उदय सिंह चिंतित हो उठा।
उसने सोचा—
“आज तक हमने इस तिलस्मी महल के केवल कुछ ही हिस्से देखे हैं। कहीं अमर सिंह इसके भीतर के रहस्यों को जानने के लिए आगे तो नहीं चला गया?”
वह तेजी से आगे बढ़ने लगा।
उसे क्या पता था कि उस तिलस्मी महल की गहराइयों में केवल उसके मित्र का रहस्य ही नहीं, बल्कि एक ऐसा रहस्य छिपा था, जो उनके जीवन को हमेशा के लिए बदल देने वाला था।
उधर उसी रात रूपवती भी अपने कक्ष में सोने गई।
आँखें बंद करते ही उसे दिन का वही दृश्य दिखाई देने लगा।
वही भीड़...
वही मधुर धुन...
और उन्हीं आँखों से मिलती उसकी आँखें...
रूपवती के होंठों पर हल्की मुस्कान आई और वह उसी मधुर स्मृति में खोकर सो गई।
लेकिन अगली सुबह क्या होने वाला था?
क्या उदय सिंह अमर सिंह को खोज पाएगा?
तिलस्मी महल के भीतर अमर सिंह कहाँ चला गया था?
और क्या उदय सिंह और रूपवती की पहली मुलाकात केवल एक संयोग थी...
या उस मुलाकात के पीछे भी कोई तिलस्मी रहस्य छिपा था?
क्रमशः...
भाग द्वितीय में जारी